श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अथापि कीर्तयाम्यङ्ग यथामति यथाश्रुतम्।

कीर्तिं हरेः स्वां सत्कर्तुं गिरमन्याभिधासतीम्॥ ३६

athāpi kīrtayāmyaṅga yathāmati yathāśrutam|

kīrtiṃ hareḥ svāṃ satkartuṃ giramanyābhidhāsatīm|| 36

अर्थ

तथापि प्यारे विदुरजी! अन्य व्यावहारिक चर्चाओंसे अपवित्र हुई अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये, जैसी मेरी बुद्धि है और जैसा मैंने गुरुमुखसे सुना है वैसा, श्रीहरिका सुयश वर्णन करता हूँ ॥ ३६॥✎ 222 223 224 225

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #223 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #224 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #225 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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