तथापि प्यारे विदुरजी! अन्य व्यावहारिक चर्चाओंसे अपवित्र हुई अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये, जैसी मेरी बुद्धि है और जैसा मैंने गुरुमुखसे सुना है वैसा, श्रीहरिका सुयश वर्णन करता हूँ ॥ ३६॥✎ 222223224225
अथापि कीर्तयाम्यङ्ग यथामति यथाश्रुतम्।
कीर्तिं हरेः स्वां सत्कर्तुं गिरमन्याभिधासतीम्॥ ३६
तथापि प्यारे विदुरजी! अन्य व्यावहारिक चर्चाओंसे अपवित्र हुई अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये, जैसी मेरी बुद्धि है और जैसा मैंने गुरुमुखसे सुना है वैसा, श्रीहरिका सुयश वर्णन करता हूँ ॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 262) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/6/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को