श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

एकान्तलाभं वचसो नु पुंसां

सुश्लोकमौलेर्गुणवादमाहुः ।

श्रुतेश्‍च विद्वद्भिरुपाकृतायां

कथासुधायामुपसम्प्रयोगम् ॥ ३७

ekāntalābhaṃ vacaso nu puṃsāṃ

suślokamaulerguṇavādamāhuḥ |

śruteśca vidvadbhirupākṛtāyāṃ

kathāsudhāyāmupasamprayogam || 37

अर्थ

महापुरुषोंका मत है कि पुण्यश्लोकशिरोमणि श्रीहरिके गुणोंका गान करना ही मनुष्योंकी वाणीका तथा विद्वानोंके मुखसे भगवत्कथामृतका पान करना ही उनके कानोंका सबसे बड़ा लाभ है॥ ३७॥✎ 222 223 224 225

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #223 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #224 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #225 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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