महापुरुषोंका मत है कि पुण्यश्लोकशिरोमणि श्रीहरिके गुणोंका गान करना ही मनुष्योंकी वाणीका तथा विद्वानोंके मुखसे भगवत्कथामृतका पान करना ही उनके कानोंका सबसे बड़ा लाभ है॥ ३७॥✎ 222223224225
एकान्तलाभं वचसो नु पुंसां
सुश्लोकमौलेर्गुणवादमाहुः ।
श्रुतेश्च विद्वद्भिरुपाकृतायां
कथासुधायामुपसम्प्रयोगम् ॥ ३७
महापुरुषोंका मत है कि पुण्यश्लोकशिरोमणि श्रीहरिके गुणोंका गान करना ही मनुष्योंकी वाणीका तथा विद्वानोंके मुखसे भगवत्कथामृतका पान करना ही उनके कानोंका सबसे बड़ा लाभ है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 262) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/6/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को