श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

आत्मनोऽवसितो वत्स महिमा कविनाऽऽदिना।

संवत्सरसहस्रान्ते धिया योगविपक्‍वया॥ ३८

ātmano'vasito vatsa mahimā kavinā''dinā|

saṃvatsarasahasrānte dhiyā yogavipakvayā|| 38

अर्थ

वत्स! हम ही नहीं, आदि-कवि श्रीब्रह्माजीने एक हजार दिव्य वर्षोंतक अपनी योगपरिपक्‍व बुद्धिसे विचार किया; तो भी क्या वे भगवान्‌की अमित महिमाका पार पा सके?॥ ३८॥✎ 222 223 224 225

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #223 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #224 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #225 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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