श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीत३स्यापि नात्मनः।

तां चापि युष्मच्चरणसेवयाहं पराणुदे॥ १८

arthābhāvaṃ viniścitya pratītasyāpi nātmanaḥ|

tāṃ cāpi yuṣmaccaraṇasevayāhaṃ parāṇude|| 18

अर्थ

भगवन्! आपकी कृपासे मुझे यह निश्‍चय हो गया कि ये अनात्म पदार्थ वस्तुतः हैं नहीं, केवल प्रतीत ही होते हैं। अब मैं आपके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे उस प्रतीतिको भी हटा दूँगा॥ १८॥✎ 228 229 230

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—तश्‍चा०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 264)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #228 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #229 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #230 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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