भगवन्! आपकी कृपासे मुझे यह निश्चय हो गया कि ये अनात्म पदार्थ वस्तुतः हैं नहीं, केवल प्रतीत ही होते हैं। अब मैं आपके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे उस प्रतीतिको भी हटा दूँगा॥ १८॥✎ 228229230
अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्यापि नात्मनः।
तां चापि युष्मच्चरणसेवयाहं पराणुदे॥ १८
भगवन्! आपकी कृपासे मुझे यह निश्चय हो गया कि ये अनात्म पदार्थ वस्तुतः हैं नहीं, केवल प्रतीत ही होते हैं। अब मैं आपके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे उस प्रतीतिको भी हटा दूँगा॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 264) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/7/18/
टिप्पणियाँ
३
प्रा० पा०—तश्चा०।
(मुद्रित पृष्ठ 264)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#228 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को