इन श्रीचरणोंकी सेवासे नित्यसिद्ध भगवान् श्रीमधुसूदनके चरणकमलोंमें उत्कट प्रेम और आनन्दकी वृद्धि होती है, जो आवागमनकी यन्त्रणाका नाश कर देती है॥ १९॥✎ 228229230
यत्सेवया भगवतः कूटस्थस्य मधुद्विषः।
रतिरासो भवेत्तीव्रः पादयोर्व्यसनार्दनः॥ १९
इन श्रीचरणोंकी सेवासे नित्यसिद्ध भगवान् श्रीमधुसूदनके चरणकमलोंमें उत्कट प्रेम और आनन्दकी वृद्धि होती है, जो आवागमनकी यन्त्रणाका नाश कर देती है॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 265) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/7/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#228 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को