श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यत्सेवया भगवतः कूटस्थस्य मधुद्विषः।

रतिरासो भवेत्तीव्रः पादयोर्व्यसनार्दनः॥ १९

yatsevayā bhagavataḥ kūṭasthasya madhudviṣaḥ|

ratirāso bhavettīvraḥ pādayorvyasanārdanaḥ|| 19

अर्थ

इन श्रीचरणोंकी सेवासे नित्यसिद्ध भगवान् श्रीमधुसूदनके चरणकमलोंमें उत्कट प्रेम और आनन्दकी वृद्धि होती है, जो आवागमनकी यन्त्रणाका नाश कर देती है॥ १९॥✎ 228 229 230

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #228 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #229 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #230 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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