॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.8.10
उदाप्लुतं१ विश्वमिदं तदाऽऽसीद्
यन्निद्रयामीलितदृङ् न्यमीलयत्।
अहीन्द्रतल्पेऽधिशयान एकः
कृतक्षणः स्वात्मरतौ२ निरीहः॥ १०
udāplutaṃ viśvamidaṃ tadā''sīd
yannidrayāmīlitadṛṅ nyamīlayat|
ahīndratalpe'dhiśayāna ekaḥ
kṛtakṣaṇaḥ svātmaratau nirīhaḥ|| 10
अर्थ
सृष्टिके पूर्व यह सम्पूर्ण विश्व जलमें डूबा हुआ था। उस समय एकमात्र श्रीनारायणदेव शेषशय्यापर पौढ़े हुए थे। वे अपनी ज्ञानशक्तिको अक्षुण्ण रखते हुए ही, योगनिद्राका आश्रय ले, अपने नेत्र मूँदे हुए थे। सृष्टिकर्मसे अवकाश लेकर आत्मानन्दमें मग्न थे। उनमें किसी भी क्रियाका उन्मेष नहीं था॥ १०॥ जिस प्रकार अग्नि अपनी दाहिका आदि शक्तियोंको छिपाये हुए काष्ठमें व्याप्त रहता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्ने सम्पूर्ण प्राणियोंके सूक्ष्म शरीरोंको अपने शरीरमें लीन करके अपने आधारभूत उस जलमें शयन किया, उन्हें सृष्टिकाल आनेपर पुनः जगानेके लिये केवल कालशक्तिको जाग्रत् रखा॥ ११॥ ✎ 234
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—उदप्लुतं।
- २
प्रा० पा०—रतावनीहः।