श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

उदाप्लुतं१ विश्‍वमिदं तदाऽऽसीद्

यन्‍निद्रयामीलितदृङ् न्यमीलयत्।

अहीन्द्रतल्पेऽधिशयान एकः

कृतक्षणः स्वात्मरतौ२ निरीहः॥ १०

udāplutaṃ viśvamidaṃ tadā''sīd

yannidrayāmīlitadṛṅ nyamīlayat|

ahīndratalpe'dhiśayāna ekaḥ

kṛtakṣaṇaḥ svātmaratau nirīhaḥ|| 10

अर्थ

सृष्टिके पूर्व यह सम्पूर्ण विश्‍व जलमें डूबा हुआ था। उस समय एकमात्र श्रीनारायणदेव शेषशय्यापर पौढ़े हुए थे। वे अपनी ज्ञानशक्तिको अक्षुण्ण रखते हुए ही, योगनिद्राका आश्रय ले, अपने नेत्र मूँदे हुए थे। सृष्टिकर्मसे अवकाश लेकर आत्मानन्दमें मग्न थे। उनमें किसी भी क्रियाका उन्मेष नहीं था॥ १०॥ जिस प्रकार अग्‍नि अपनी दाहिका आदि शक्तियोंको छिपाये हुए काष्ठमें व्याप्त रहता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्‌ने सम्पूर्ण प्राणियोंके सूक्ष्म शरीरोंको अपने शरीरमें लीन करके अपने आधारभूत उस जलमें शयन किया, उन्हें सृष्टिकाल आनेपर पुनः जगानेके लिये केवल कालशक्तिको जाग्रत् रखा॥ ११॥ ✎ 234

यह व्याख्या श्लोक 3.8.10 से 3.8.11 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—उदप्लुतं।

    (मुद्रित पृष्ठ 268)
  2. २

    प्रा० पा०—रतावनीहः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 268)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #234 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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