उस समय प्रलयकालीन पवनके थपेड़ोंसे उछलती हुई जलकी तरंगमालाओंके कारण उस जलराशिसे ऊपर उठे हुए कमलपर विराजमान आदिदेव ब्रह्माजीको अपना तथा उस लोकतत्त्वरूप कमलका कुछ भी रहस्य न जान पड़ा॥ १७॥✎ 235236
तस्माद्युगान्तश्वसनावघूर्ण-
जलोर्मिचक्रात्सलिलाद्विरूढम् ।
उपाश्रितः कञ्जमु लोकतत्त्वं
नात्मानमद्धाविददादिदेवः ॥ १७
उस समय प्रलयकालीन पवनके थपेड़ोंसे उछलती हुई जलकी तरंगमालाओंके कारण उस जलराशिसे ऊपर उठे हुए कमलपर विराजमान आदिदेव ब्रह्माजीको अपना तथा उस लोकतत्त्वरूप कमलका कुछ भी रहस्य न जान पड़ा॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.8.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 269) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/8/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#235 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की