श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ

एतत्कुतो वाब्जमनन्यदप्सु।

अस्ति ह्यधस्तादिह किञ्चनैत-

दधिष्ठितं यत्र सता नु भाव्यम्॥ १८

ka eṣa yo'sāvahamabjapṛṣṭha

etatkuto vābjamananyadapsu|

asti hyadhastādiha kiñcanaita-

dadhiṣṭhitaṃ yatra satā nu bhāvyam|| 18

अर्थ

वे सोचने लगे, ‘इस कमलकी कर्णिकापर बैठा हुआ मैं कौन हूँ? यह कमल भी बिना किसी अन्य आधारके जलमें कहाँसे उत्पन्‍न हो गया? इसके नीचे अवश्य कोई ऐसी वस्तु होनी चाहिये, जिसके आधारपर यह स्थित है’॥ १८॥

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