॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.9.20
योऽविद्ययानुपहतोऽपि दशार्धवृत्त्या
निद्रामुवाह जठरीकृतलोकयात्रः।
अन्तर्जलेऽहिकशिपुस्पर्शानुकूलां
भीमोर्मिमालिनि जनस्य सुखं विवृण्वन्॥ २०
yo'vidyayānupahato'pi daśārdhavṛttyā
nidrāmuvāha jaṭharīkṛtalokayātraḥ|
antarjale'hikaśipusparśānukūlāṃ
bhīmormimālini janasya sukhaṃ vivṛṇvan|| 20
अर्थ
प्रभो! आप अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—पाँचोंमेंसे किसीके भी अधीन नहीं हैं; तथापि इस समय जो सारे संसारको अपने उदरमें लीनकर भयंकर तरंगमालाओंसे विक्षुब्ध प्रलयकालीन जलमें अनन्तविग्रहकी कोमल शय्यापर शयन कर रहे हैं, वह पूर्वकल्पकी कर्मपरम्परासे श्रमित हुए जीवोंको विश्राम देनेके लिये ही है॥ २०॥✎ 238