श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

स्वसम्भवं निशाम्यैवं तपोविद्यासमाधिभिः।

यावन्मनोवचः स्तुत्वा विरराम स खिन्‍नवत्॥ २६

svasambhavaṃ niśāmyaivaṃ tapovidyāsamādhibhiḥ|

yāvanmanovacaḥ stutvā virarāma sa khinnavat|| 26

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार तप, विद्या और समाधिके द्वारा अपने उत्पत्तिस्थान श्रीभगवान्‌को देखकर तथा अपने मन और वाणीकी शक्तिके अनुसार उनकी स्तुति कर ब्रह्माजी थके-से होकर मौन हो गये॥ २६॥✎ 239 240

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #239 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् ने → श्रीमधुसूदनभगवान्‌ने
  • #240 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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