श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यदा तु सर्वभूतेषु दारुष्वग्‍निमिव स्थितम्।

प्र१तिचक्षीत मां लोको जह्या२त्तर्ह्येव कश्मलम्॥ ३२

yadā tu sarvabhūteṣu dāruṣvagnimiva sthitam|

praticakṣīta māṃ loko jahyāttarhyeva kaśmalam|| 32

अर्थ

जिस समय जीव काष्ठमें व्याप्त अग्‍निके समान समस्त भूतोंमें मुझे ही स्थित देखता है, उसी समय वह अपने अज्ञानरूप मलसे मुक्त हो जाता है॥ ३२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रवि० ।

    (मुद्रित पृष्ठ 277)
  2. २

    प्रा० पा०—जह्यां त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 277)

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