श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तत आत्मनि लोके च भक्तियुक्तः समाहितः।

द्रष्टासि मां ततं ब्रह्मन्मयि लोकांस्त्वमात्मनः॥ ३१

tata ātmani loke ca bhaktiyuktaḥ samāhitaḥ|

draṣṭāsi māṃ tataṃ brahmanmayi lokāṃstvamātmanaḥ|| 31

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—वेदगर्भ! तुम विषादके वशीभूत हो आलस्य न करो, सृष्टिरचनाके उद्यममें तत्पर हो जाओ। तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, उसे तो मैं पहले ही कर चुका हूँ॥ २९॥ तुम एक बार फिर तप करो और भागवत-ज्ञानका अनुष्ठान करो। उनके द्वारा तुम सब लोकोंको स्पष्टतया अपने अन्तःकरणमें देखोगे॥ ३०॥ फिर भक्तियुक्त और समाहितचित्त होकर तुम सम्पूर्ण लोक और अपनेमें मुझको व्याप्त देखोगे तथा मुझमें सम्पूर्ण लोक और अपने-आपको देखोगे॥ ३१॥ ✎ 241

यह व्याख्या श्लोक 3.9.29 से 3.9.31 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #241 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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