॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.9.6
तावद्भयं द्रविणगेह१सुहृन्निमित्तं
शोकः स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभः।
तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं
यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः॥ ६
tāvadbhayaṃ draviṇagehasuhṛnnimittaṃ
śokaḥ spṛhā paribhavo vipulaśca lobhaḥ|
tāvanmametyasadavagraha ārtimūlaṃ
yāvanna te'ṅghrimabhayaṃ pravṛṇīta lokaḥ|| 6
अर्थ
जबतक पुरुष आपके अभयप्रद चरणारविन्दोंका आश्रय नहीं लेता, तभीतक उसे धन, घर और बन्धुजनोंके कारण प्राप्त होनेवाले भय, शोक, लालसा, दीनता और अत्यन्त लोभ आदि सताते हैं और तभीतक उसे मैं-मेरेपनका दुराग्रह रहता है, जो दुःखका एकमात्र कारण है॥ ६॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—द्रविणदेह०।