श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

दैवेन ते हतधियो भवतः प्रसङ्गात्

सर्वाशुभोपशमनाद्विमुखेन्द्रिया ये।

कुर्वन्ति कामसुखलेशलवाय दीना

लोभाभिभूतमनसोऽकुशलानि शश्‍वत्॥ ७

daivena te hatadhiyo bhavataḥ prasaṅgāt

sarvāśubhopaśamanādvimukhendriyā ye|

kurvanti kāmasukhaleśalavāya dīnā

lobhābhibhūtamanaso'kuśalāni śaśvat|| 7

अर्थ

जो लोग सब प्रकारके अमंगलोंको नष्ट करनेवाले आपके श्रवण-कीर्तनादि प्रसंगोंसे इन्द्रियोंको हटाकर लेशमात्र विषय-सुखके लिये दीन और मन-ही-मन लालायित होकर निरन्तर दुष्कर्मोंमें लगे रहते हैं, उन बेचारोंकी बुद्धि दैवने हर ली है॥ ७॥

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