शत्रुतापन विदुरजी! पूर्णिमाके विरज और विश्वग नामके दो पुत्र तथा देवकुल्या नामकी एक कन्या हुई। यही दूसरे जन्ममें श्रीहरिके चरणोंके धोवनसे देवनदी गंगाके रूपमें प्रकट हुई॥ १४॥
पूर्णिमासूत विरजं विश्वगं च परंतप।
देवकुल्यां हरेः पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिवः॥ १४
शत्रुतापन विदुरजी! पूर्णिमाके विरज और विश्वग नामके दो पुत्र तथा देवकुल्या नामकी एक कन्या हुई। यही दूसरे जन्ममें श्रीहरिके चरणोंके धोवनसे देवनदी गंगाके रूपमें प्रकट हुई॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 406) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/1/14/