क्योंकि मैंने तो सन्तानप्राप्तिकी इच्छासे केवल एक सुरेश्वर भगवान्का ही चिन्तन किया था। फिर आप तीनोंने यहाँ पधारनेकी कृपा कैसे की? आप-लोगोंतक तो देहधारियोंके मनकी भी गति नहीं है, इसलिये मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। आपलोग कृपा करके मुझे इसका रहस्य बतलाइये॥ २८॥
एको मयेह भगवान् विबुधप्रधान-
श्चित्तीकृतः प्रजननाय कथं नु यूयम्।
अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूरा
ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे॥ २८
क्योंकि मैंने तो सन्तानप्राप्तिकी इच्छासे केवल एक सुरेश्वर भगवान्का ही चिन्तन किया था। फिर आप तीनोंने यहाँ पधारनेकी कृपा कैसे की? आप-लोगोंतक तो देहधारियोंके मनकी भी गति नहीं है, इसलिये मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। आपलोग कृपा करके मुझे इसका रहस्य बतलाइये॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 408) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/1/28/