॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.1.54
दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतुः कुसुमवृष्टयः।
मुनयस्तुष्टुवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः॥ ५४
divyavādyanta tūryāṇi petuḥ kusumavṛṣṭayaḥ|
munayastuṣṭuvustuṣṭā jagurgandharvakinnarāḥ|| 54
अर्थ
आकाशमें मांगलिक बाजे बजने लगे, देवतालोग फूलोंकी वर्षा करने लगे, मुनि प्रसन्न होकर स्तुति करने लगे, गन्धर्व और किन्नर गाने लगे॥ ५४॥✎ 356