श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.53

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

ययोर्जन्मन्यदो विश्‍वमभ्यनन्दत्सुनिर्वृतम्।

मनांसि ककुभो वाताः प्रसेदुः सरितोऽद्रयः॥ ५३

yayorjanmanyado viśvamabhyanandatsunirvṛtam|

manāṃsi kakubho vātāḥ praseduḥ sarito'drayaḥ|| 53

अर्थ

इनका जन्म होनेपर इस सम्पूर्ण विश्‍वने आनन्दित होकर प्रसन्‍नता प्रकट की। उस समय लोगोंके मन, दिशाएँ, वायु, नदी और पर्वत—सभीमें प्रसन्‍नता छा गयी॥ ५३॥✎ 356

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #356 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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