श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.62

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

वैतानिके कर्मणि यन्‍नामभिर्ब्रह्मवादिभिः।

आग्नेय्य इष्टयो यज्ञे निरूप्यन्तेऽग्नयस्तु ते॥ ६२

vaitānike karmaṇi yannāmabhirbrahmavādibhiḥ|

āgneyya iṣṭayo yajñe nirūpyante'gnayastu te|| 62

अर्थ

वेदज्ञ ब्राह्मण वैदिक यज्ञकर्ममें जिन उनचास अग्‍नियोंके नामोंसे आग्नेयी इष्टियाँ करते हैं, वे ये ही हैं॥ ६२॥

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