श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.10.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

मुनय ऊचुः

औत्तानपादे भगवांस्तव शार्ङ्गधन्वा

देवः क्षिणोत्ववनतार्तिहरो विपक्षान्।

यन्‍नामधेयमभिधाय निशम्य चाद्धा

लोकोऽञ्जसा तरति दुस्तरमंग मृत्युम्॥ ३०

auttānapāde bhagavāṃstava śārṅgadhanvā

devaḥ kṣiṇotvavanatārtiharo vipakṣān|

yannāmadheyamabhidhāya niśamya cāddhā

loko'ñjasā tarati dustaramaṃga mṛtyum|| 30

अर्थ

मुनियोंने कहा—उत्तानपादनन्दन ध्रुव! शरणागत-भयभंजन शार्ङ्गपाणि भगवान् नारायण तुम्हारे शत्रुओंका संहार करें। भगवान्‌का तो नाम ही ऐसा है, जिसके सुनने और कीर्तन करनेमात्रसे मनुष्य दुस्तर मृत्युके मुखसे अनायास ही बच जाता है॥ ३०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे दशमोऽध्यायः॥ १०॥

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