॥ श्रीहरिः ॥
अथैकादशोऽध्यायः
स्वायम्भुव-मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना
मैत्रेय उवाच
निशम्य गदतामेवमृषीणां धनुषि ध्रुवः।
संदधेऽस्त्रमुपस्पृश्य यन्नारायणनिर्मितम्॥ १
niśamya gadatāmevamṛṣīṇāṃ dhanuṣi dhruvaḥ|
saṃdadhe'stramupaspṛśya yannārāyaṇanirmitam|| 1
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ऋषियोंका ऐसा कथन सुनकर महाराज ध्रुवने आचमन कर श्रीनारायणके बनाये हुए नारायणास्त्रको अपने धनुषपर चढ़ाया॥ १॥
निशम्य गदतामेवमृषीणां धनुषि ध्रुवः।
संदधेऽस्त्रमुपस्पृश्य यन्नारायणनिर्मितम्॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ऋषियोंका ऐसा कथन सुनकर महाराज ध्रुवने आचमन कर श्रीनारायणके बनाये हुए नारायणास्त्रको अपने धनुषपर चढ़ाया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 463) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/1/