श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

संधीयमान एतस्मिन्माया गुह्यकनिर्मिताः।

क्षिप्रं विनेशुर्विदुर क्लेशा ज्ञानोदये यथा॥ २

saṃdhīyamāna etasminmāyā guhyakanirmitāḥ|

kṣipraṃ vineśurvidura kleśā jñānodaye yathā|| 2

अर्थ

उस बाणके चढ़ाते ही यक्षोंद्वारा रची हुई नाना प्रकारकी माया उसी क्षण नष्ट हो गयी, जिस प्रकार ज्ञानका उदय होनेपर अविद्यादि क्लेश नष्ट हो जाते हैं॥ २॥

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