उस बाणके चढ़ाते ही यक्षोंद्वारा रची हुई नाना प्रकारकी माया उसी क्षण नष्ट हो गयी, जिस प्रकार ज्ञानका उदय होनेपर अविद्यादि क्लेश नष्ट हो जाते हैं॥ २॥
संधीयमान एतस्मिन्माया गुह्यकनिर्मिताः।
क्षिप्रं विनेशुर्विदुर क्लेशा ज्ञानोदये यथा॥ २
उस बाणके चढ़ाते ही यक्षोंद्वारा रची हुई नाना प्रकारकी माया उसी क्षण नष्ट हो गयी, जिस प्रकार ज्ञानका उदय होनेपर अविद्यादि क्लेश नष्ट हो जाते हैं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 463) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/11/2/