इस जड शरीरको ही आत्मा मानकर इसके लिये पशुओंकी भाँति प्राणियोंकी हिंसा करना यह भगवत्सेवी साधुजनोंका मार्ग नहीं है॥ १०॥
नायं मार्गो हि साधूनां हृषीकेशानुवर्तिनाम्।
यदात्मानं पराग्गृह्य पशुवद्भूतवैशसम्॥ १०
इस जड शरीरको ही आत्मा मानकर इसके लिये पशुओंकी भाँति प्राणियोंकी हिंसा करना यह भगवत्सेवी साधुजनोंका मार्ग नहीं है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 464) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/10/