तुम्हें तो प्रभु भी अपना प्रिय भक्त समझते हैं तथा भक्तजन भी तुम्हारा आदर करते हैं। तुम साधुजनोंके पथप्रदर्शक हो; फिर भी तुमने ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे किया?॥ १२॥
स त्वं हरेरनुध्यातस्तत्पुंसामपि सम्मतः।
कथं त्ववद्यं कृतवाननुशिक्षन् सतां व्रतम्॥ १२
तुम्हें तो प्रभु भी अपना प्रिय भक्त समझते हैं तथा भक्तजन भी तुम्हारा आदर करते हैं। तुम साधुजनोंके पथप्रदर्शक हो; फिर भी तुमने ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे किया?॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 465) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/12/