श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्त

आनन्दमात्र उपपन्‍नसमस्तशक्तौ।

भक्तिं विधाय परमां शनकैरविद्या-

ग्रन्थिं विभेत्स्यसि ममाहमिति प्ररूढम्॥ ३०

tvaṃ pratyagātmani tadā bhagavatyananta

ānandamātra upapannasamastaśaktau|

bhaktiṃ vidhāya paramāṃ śanakairavidyā-

granthiṃ vibhetsyasi mamāhamiti prarūḍham|| 30

अर्थ

ऐसा करनेसे सर्वशक्तिसम्पन्‍न परमानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी भगवान् अनन्तमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति होगी और उसके प्रभावसे तुम मैं-मेरेपनके रूपमें दृढ़ हुई अविद्याकी गाँठको काट डालोगे॥ ३०॥

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