saṃyaccha roṣaṃ bhadraṃ te pratīpaṃ śreyasāṃ param|
śrutena bhūyasā rājannagadena yathā''mayam|| 31
अर्थ
राजन्! जिस प्रकार ओषधिसे रोग शान्त किया जाता है—उसी प्रकार मैंने तुम्हें जो कुछ उपदेश दिया है, उसपर विचार करके अपने क्रोधको शान्त करो। क्रोध कल्याणमार्गका बड़ा ही विरोधी है। भगवान् तुम्हारा मंगल करें॥ ३१॥
संयच्छ रोषं भद्रं ते प्रतीपं श्रेयसां परम्।
श्रुतेन भूयसा राजन्नगदेन यथाऽऽमयम्॥ ३१
राजन्! जिस प्रकार ओषधिसे रोग शान्त किया जाता है—उसी प्रकार मैंने तुम्हें जो कुछ उपदेश दिया है, उसपर विचार करके अपने क्रोधको शान्त करो। क्रोध कल्याणमार्गका बड़ा ही विरोधी है। भगवान् तुम्हारा मंगल करें॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 467) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/31/