॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.11.5
स तान् पृषत्कैरभिधावतो मृधे
निकृत्तबाहूरुशिरोधरोदरान् ।
निनाय लोकं परमर्कमण्डलं
व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः॥ ५
sa tān pṛṣatkairabhidhāvato mṛdhe
nikṛttabāhūruśirodharodarān |
nināya lokaṃ paramarkamaṇḍalaṃ
vrajanti nirbhidya yamūrdhvaretasaḥ|| 5
अर्थ
उन्हें सामने आते देख ध्रुवजीने अपने बाणोंद्वारा उनकी भुजाएँ, जाँघें, कंधे और उदर आदि अंग-प्रत्यंगोंको छिन्न-भिन्न कर उन्हें उस सर्वश्रेष्ठ लोक (सत्यलोक)में भेज दिया, जिसमें ऊर्ध्वरेता मुनिगण सूर्यमण्डलका भेदन करके जाते हैं॥ ५॥✎ 1599