श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तान् हन्यमानानभिवीक्ष्य गुह्यका-

ननागसश्चित्ररथेन भूरिशः।

औत्तानपादिं कृपया पितामहो

मनुर्जगादोपगतः सहर्षिभिः॥ ६

tān hanyamānānabhivīkṣya guhyakā-

nanāgasaścitrarathena bhūriśaḥ|

auttānapādiṃ kṛpayā pitāmaho

manurjagādopagataḥ saharṣibhiḥ|| 6

अर्थ

अब उनके पितामह स्वायम्भुव मनुने देखा कि विचित्र रथपर चढ़े हुए ध्रुव अनेकों निरपराध यक्षोंको मार रहे हैं, तो उन्हें उनपर बहुत दया आयी। वे बहुत-से ऋषियोंको साथ लेकर वहाँ आये और अपने पौत्र ध्रुवको समझाने लगे॥ ६॥✎ 1599

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1599 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (सत्यलोक)-में → (सत्यलोक)में

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें