तात! तुम जो निर्दोष यक्षोंके संहारपर उतर रहे हो, यह हमारे कुलके योग्य कर्म नहीं है; साधु पुरुष इसकी बड़ी निन्दा करते हैं॥ ८॥
नास्मत्कुलोचितं तात कर्मैतत्सद्विगर्हितम्।
वधो यदुपदेवानामारब्धस्तेऽकृतैनसाम्॥ ८
तात! तुम जो निर्दोष यक्षोंके संहारपर उतर रहे हो, यह हमारे कुलके योग्य कर्म नहीं है; साधु पुरुष इसकी बड़ी निन्दा करते हैं॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 464) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/11/8/