श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.44

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।

ध्रुवस्योद्दामयशसश्‍चरितं सम्मतं सताम्॥ ४४

etatte'bhihitaṃ sarvaṃ yatpṛṣṭo'hamiha tvayā|

dhruvasyoddāmayaśasaścaritaṃ sammataṃ satām|| 44

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! तुमने मुझसे उदारकीर्ति ध्रुवजीके चरित्रके विषयमें पूछा था, सो मैंने तुम्हें वह पूरा-का-पूरा सुना दिया। साधुजन इस चरित्रकी बड़ी प्रशंसा करते हैं॥ ४४॥✎ 384

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #384 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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