श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! तुमने मुझसे उदारकीर्ति ध्रुवजीके चरित्रके विषयमें पूछा था, सो मैंने तुम्हें वह पूरा-का-पूरा सुना दिया। साधुजन इस चरित्रकी बड़ी प्रशंसा करते हैं॥ ४४॥✎ 384
एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।
ध्रुवस्योद्दामयशसश्चरितं सम्मतं सताम्॥ ४४
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! तुमने मुझसे उदारकीर्ति ध्रुवजीके चरित्रके विषयमें पूछा था, सो मैंने तुम्हें वह पूरा-का-पूरा सुना दिया। साधुजन इस चरित्रकी बड़ी प्रशंसा करते हैं॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 472) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/12/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)