श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वस्त्ययनं महत्।

स्वर्ग्यं ध्रौव्यं सौमनस्यं प्रशस्यमघमर्षणम्॥ ४५

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ puṇyaṃ svastyayanaṃ mahat|

svargyaṃ dhrauvyaṃ saumanasyaṃ praśasyamaghamarṣaṇam|| 45

अर्थ

यह धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त मंगलमय है। इससे स्वर्ग और अविनाशी पद भी प्राप्त हो सकता है। यह देवत्वकी प्राप्ति करानेवाला, बड़ा ही प्रशंसनीय और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४५॥✎ 384

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #384 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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