श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

नावध्येयः प्रजापालः प्रजाभिरघवानपि।

यदसौ लोकपालानां बिभर्त्योजः स्वतेजसा॥ २३

nāvadhyeyaḥ prajāpālaḥ prajābhiraghavānapi|

yadasau lokapālānāṃ bibhartyojaḥ svatejasā|| 23

अर्थ

प्रजाका कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजासे कोई पाप बन जाय तो भी उसका तिरस्कार न करे; क्योंकि वह अपने प्रभावसे आठ लोकपालोंके तेजको धारण करता है॥ २३॥

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