प्रजाका कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजासे कोई पाप बन जाय तो भी उसका तिरस्कार न करे; क्योंकि वह अपने प्रभावसे आठ लोकपालोंके तेजको धारण करता है॥ २३॥
नावध्येयः प्रजापालः प्रजाभिरघवानपि।
यदसौ लोकपालानां बिभर्त्योजः स्वतेजसा॥ २३
प्रजाका कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजासे कोई पाप बन जाय तो भी उसका तिरस्कार न करे; क्योंकि वह अपने प्रभावसे आठ लोकपालोंके तेजको धारण करता है॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 475) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/13/23/