‘सदस्यो! देवतालोग आवाहन करनेपर भी यज्ञमें नहीं आ रहे हैं और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है?’॥ ३०॥
नागच्छन्त्याहुता देवा न गृह्णन्ति ग्रहानिह।
सदसस्पतयो ब्रूत किमवद्यं मया कृतम्॥ ३०
‘सदस्यो! देवतालोग आवाहन करनेपर भी यज्ञमें नहीं आ रहे हैं और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है?’॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 476) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/13/30/