श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सदसस्पतय ऊचुः

नरदेवेह भवतो१ नाघं तावन्मनाक् स्थितम्।

अस्त्येकं प्राक्तनम२घं यदिहेदृक् त्वमप्रजः॥ ३१

naradeveha bhavato nāghaṃ tāvanmanāk sthitam|

astyekaṃ prāktanamaghaṃ yadihedṛk tvamaprajaḥ|| 31

अर्थ

सदस्योंने कहा—राजन्! इस जन्ममें तो आपसे तनिक भी अपराध नहीं हुआ; हाँ, पूर्वजन्मका एक अपराध अवश्य है, जिसके कारण आप ऐसे सर्वगुणसम्पन्‍न होनेपर भी पुत्रहीन हैं॥ ३१॥✎ 1601

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—भवता चावद्यं किं क्रियान्वितम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 476)
  2. २

    प्रा० पा०—प्राक्तनावद्यम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 476)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1601 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सर्वगुण-सम्पन्‍न → सर्वगुणसम्पन्‍न

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