श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

स विप्रानुमतो राजा गृहीत्वाञ्जलिनौदनम्।

अवघ्राय मुदा युक्तः प्रादात्पत्न्या उदारधीः॥ ३७

sa viprānumato rājā gṛhītvāñjalinaudanam|

avaghrāya mudā yuktaḥ prādātpatnyā udāradhīḥ|| 37

अर्थ

उदारबुद्धि राजा अंगने याजकोंकी अनुमतिसे अपनी अंजलिमें वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूँघकर प्रसन्‍नतापूर्वक अपनी पत्नीको दे दिया॥ ३७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें