kadapatyabhṛtaṃ duḥkhaṃ ye na vindanti durbharam|| 43
अर्थ
(वे मन-ही-मन कहने लगे—) ‘जिन गृहस्थोंके पुत्र नहीं हैं, उन्होंने अवश्य ही पूर्वजन्ममें श्रीहरिकी आराधना की होगी; इसीसे उन्हें कुपूतकी करतूतोंसे होनेवाले असह्य क्लेश नहीं सहने पड़ते॥ ४३॥
प्रायेणाभ्यर्चितो देवो येऽप्रजा गृहमेधिनः।
कदपत्यभृतं दुःखं ये न विन्दन्ति दुर्भरम्॥ ४३
(वे मन-ही-मन कहने लगे—) ‘जिन गृहस्थोंके पुत्र नहीं हैं, उन्होंने अवश्य ही पूर्वजन्ममें श्रीहरिकी आराधना की होगी; इसीसे उन्हें कुपूतकी करतूतोंसे होनेवाले असह्य क्लेश नहीं सहने पड़ते॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 477) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/13/43/