वेनकी ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर महाराज अंगने उसे तरह-तरहसे सुधारनेकी चेष्टा की; परन्तु वे उसे सुमार्गपर लानेमें समर्थ न हुए। इससे उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ॥ ४२॥
तं विचक्ष्य खलं पुत्रं शासनैर्विविधैर्नृपः।
यदा न शासितुं कल्पो भृशमासीत्सुदुर्मनाः॥ ४२
वेनकी ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर महाराज अंगने उसे तरह-तरहसे सुधारनेकी चेष्टा की; परन्तु वे उसे सुमार्गपर लानेमें समर्थ न हुए। इससे उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 477) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/13/42/