॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.14.21
तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं
त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम्।
यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते
राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि॥ २१
taṃ sarvalokāmarayajñasaṃgrahaṃ
trayīmayaṃ dravyamayaṃ tapomayam|
yajñairvicitrairyajato bhavāya te
rājan svadeśānanuroddhumarhasi|| 21
अर्थ
राजन्! भगवान् श्रीहरि समस्त लोक, लोकपाल और यज्ञोंके नियन्ता हैं; वे वेदत्रयीरूप, द्रव्यरूप और तपःस्वरूप हैं। इसलिये आपके जो देशवासी आपकी उन्नतिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञोंसे भगवान्का यजन करते हैं, आपको उनके अनुकूल ही रहना चाहिये॥ २१॥