श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः।

जीवञ्जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम्॥ ३१

hanyatāṃ hanyatāmeṣa pāpaḥ prakṛtidāruṇaḥ|

jīvañjagadasāvāśu kurute bhasmasād dhruvam|| 31

अर्थ

‘मार डालो! इस स्वभावसे ही दुष्ट पापीको मार डालो! यह यदि जीता रह गया तो कुछ ही दिनोंमें संसारको अवश्य भस्म कर डालेगा॥ ३१॥✎ 388 1603

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्‌की
  • #1603 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज-सिंहासनके → राजसिंहासनके

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