कल्याणरूप विदुरजी! अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझनेवाले वेनने जब उन मुनियोंका इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँगको व्यर्थ हुई देख वे उसपर अत्यन्त कुपित हो गये॥ ३०॥✎ 3881603
इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना।
भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः॥ ३०
कल्याणरूप विदुरजी! अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझनेवाले वेनने जब उन मुनियोंका इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँगको व्यर्थ हुई देख वे उसपर अत्यन्त कुपित हो गये॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 481) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्की