anunīyamānastadyācñāṃ na cakre bhraṣṭamaṃgalaḥ|| 29
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार विपरीत बुद्धि होनेके कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियोंके बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करनेपर भी उसने उनकी बातपर ध्यान न दिया॥ २९॥✎ 3881603
इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः।
अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टमंगलः॥ २९
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार विपरीत बुद्धि होनेके कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियोंके बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करनेपर भी उसने उनकी बातपर ध्यान न दिया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 481) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/29/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—भेजे।
(मुद्रित पृष्ठ 481)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्की