श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एकदा मुनयस्ते तु सर५स्वत्सलिलाप्लुताः।

हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्‍चक्रुरुपविष्टाः सरित्तटे॥ ३६

ekadā munayaste tu sarasvatsalilāplutāḥ|

hutvāgnīn satkathāścakrurupaviṣṭāḥ sarittaṭe|| 36

अर्थ

एक दिन वे मुनिगण सरस्वतीके पवित्र जलमें स्नान कर अग्‍निहोत्रसे निवृत्त हो नदीके तीरपर बैठे हुए हरिचर्चा कर रहे थे॥ ३६॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—सरित्स्वच्छ जला०।

    (मुद्रित पृष्ठ 481)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें