॥ श्रीहरिः ॥
वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम्।
विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः॥ ७
venasyāvekṣya munayo durvṛttasya viceṣṭitam|
vimṛśya lokavyasanaṃ kṛpayocuḥ sma satriṇaḥ|| 7
अर्थ
दुष्ट वेनका ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसारपर संकट आया समझकर करुणावश आपसमें कहने लगे॥ ७॥✎ 1602
वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम्।
विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः॥ ७
दुष्ट वेनका ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसारपर संकट आया समझकर करुणावश आपसमें कहने लगे॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 478) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1602 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समझ-कर → समझकर