‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ीके बीचमें रहनेवाले चींटी आदि जीव महान् संकटमें पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजाके और दूसरी ओर चोर-डाकुओंके अत्याचारसे महान् संकटमें पड़ रही है॥ ८॥✎ 1602
अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत्।
दारुण्युभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः॥ ८
‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ीके बीचमें रहनेवाले चींटी आदि जीव महान् संकटमें पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजाके और दूसरी ओर चोर-डाकुओंके अत्याचारसे महान् संकटमें पड़ रही है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 478) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)