हमने अराजकताके भयसे ही अयोग्य होनेपर भी वेनको राजा बनाया था; किन्तु अब उससे भी प्रजाको भय हो गया। ऐसी अवस्थामें प्रजाको किस प्रकार सुख-शान्ति मिल सकती है?॥ ९॥✎ 1602
अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः।
ततोऽप्यासीद्भयं त्वद्य कथं स्यात्स्वस्ति देहिनाम्॥ ९
हमने अराजकताके भयसे ही अयोग्य होनेपर भी वेनको राजा बनाया था; किन्तु अब उससे भी प्रजाको भय हो गया। ऐसी अवस्थामें प्रजाको किस प्रकार सुख-शान्ति मिल सकती है?॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 479) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)