श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एष स्वसद्मोपवने समेत्य

सनत्कुमारं भगवन्तमेकम्।

आराध्य भक्‍त्यालभतामलं तज्-

ज्ञानं यतो ब्रह्म परं विदन्ति॥ २५

eṣa svasadmopavane sametya

sanatkumāraṃ bhagavantamekam|

ārādhya bhaktyālabhatāmalaṃ taj-

jñānaṃ yato brahma paraṃ vidanti|| 25

अर्थ

अपने महलके बगीचेमें इनकी एक बार भगवान् सनत्कुमारसे भेंट होगी। अकेले उनकी भक्तिपूर्वक सेवा करके ये उस निर्मल ज्ञानको प्राप्त करेंगे, जिससे परब्रह्मकी प्राप्ति होती है॥ २५॥✎ 1604

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1604 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बातों-की-बातमें → बातोंकी-बातमें

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