श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

वसु काल उपादत्ते काले चायं विमुंचति।

समः सर्वेषु भूतेषु प्रतपन् सूर्यवद्विभुः॥ ६

vasu kāla upādatte kāle cāyaṃ vimuṃcati|

samaḥ sarveṣu bhūteṣu pratapan sūryavadvibhuḥ|| 6

अर्थ

ये सूर्यके समान अलौकिक, महिमान्वित, प्रतापवान् और समदर्शी होंगे। जिस प्रकार सूर्य देवता आठ महीने तपते रहकर जल खींचते हैं और वर्षा-ऋतुमें उसे उड़ेल देते हैं, उसी प्रकार ये कर आदिके द्वारा कभी धन-संचय करेंगे और कभी उसका प्रजाके हितके लिये व्यय कर डालेंगे॥ ६॥

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