श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तितिक्षत्यक्रमं वैन्य उपर्याक्रमतामपि।

भूतानां करुणः शश्‍वदार्तानां क्षितिवृत्तिमान्॥ ७

titikṣatyakramaṃ vainya uparyākramatāmapi|

bhūtānāṃ karuṇaḥ śaśvadārtānāṃ kṣitivṛttimān|| 7

अर्थ

ये बड़े दयालु होंगे। यदि कभी कोई दीन पुरुष इनके मस्तकपर पैर भी रख देगा, तो भी ये पृथ्वीके समान उसके इस अनुचित व्यवहारको सदा सहन करेंगे॥ ७॥

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