अब मैं अपने बाणोंसे तुझे छिन्न-भिन्न कर तेरे मेदेसे इन क्षुधातुर और दीन प्रजाजनोंका करुण-क्रन्दन शान्त करूँगा॥ २५॥✎ 393394395396397398399
अमूषां क्षुत्परीतानामार्तानां परिदेवितम्।
शमयिष्यामि मद्बाणैर्भिन्नायास्तव मेदसा॥ २५
अब मैं अपने बाणोंसे तुझे छिन्न-भिन्न कर तेरे मेदेसे इन क्षुधातुर और दीन प्रजाजनोंका करुण-क्रन्दन शान्त करूँगा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 491) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/17/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (7)