श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

पुमान् योषिदुत क्लीब आत्मसम्भावनोऽधमः।

भूतेषु निरनुक्रोशो नृपाणां तद्वधोऽवधः॥ २६

pumān yoṣiduta klība ātmasambhāvano'dhamaḥ|

bhūteṣu niranukrośo nṛpāṇāṃ tadvadho'vadhaḥ|| 26

अर्थ

जो दुष्ट अपना ही पोषण करनेवाला तथा अन्य प्राणियोंके प्रति निर्दय हो—वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो—उसका मारना राजाओंके लिये न मारनेके ही समान है॥ २६॥✎ 393 394 395 396 397 398 399

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (7)
  • #393 शब्दोंके बीचका स्थान: जोदुष्ट → जो दुष्ट
  • #394 शब्दोंके बीचका स्थान: गर्भसेनिकालती → गर्भसे निकालती
  • #395 शब्दोंके बीचका स्थान: कियेहुए → किये हुए
  • #396 शब्दोंके बीचका स्थान: करनेपरतुझे → करनेपर तुझे
  • #397 शब्दोंके बीचका स्थान: औरअपने → और अपने
  • #398 शब्दोंके बीचका स्थान: तूजो → तू जो
  • #399 शब्दोंके बीचका स्थान: भागतो → भाग तो

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